बारात पर बारात आती रही, चिंताओं का कारवाँ बढ़ता रहा;
आँखों से नींद उड़ती रही, महफिल में खामोशी बढ़ती गई;
कर्मो के शिकंज जलते रहे, अंतर में आनंद डूबता रहा;
गैरों के वाह-वाह में खोते रहे, नशे के धुए में खोते रहे;
जीवन में हारते रहे, खुद को ही भूलते रहे।
ये पीढ़ी शिकवे में डूबती रही, हालात का सामना करना भूलती रही;
यकीन पर न यकीन करती रही, समझौता न आरजू से करती रही;
बेहूदा वर्तनो में झूझती रही, अंगारों के शोलो को सुख मानती रही;
जन्नत को जहन्नुम बनाती रही, अपने जीवन को नष्ट करती रही;
अल्लाह के नाम पर गुमराह होती रही, तबाई की ओर बढ़ती रही।
पीर फकीरों की इस वादी को भूलती रही, अपने ख्वाहिशों में सज़ा लेती रही।
मुल्क के नाम पर हथियार उठाती रही, खुद को न खुद से आज़ाद कर सकी।
बेइंतहा जिहाद को पुकारती रही, नाजुक बंधन को तोड़ती रही।
दीवानगी में शाही को भूलती रही, बंदूक में लोकतंत्र की हत्या करती रही।
नापाक जीवन को कुरबान करती रही, क्या मक्सद है वो भूलती रही।
मौला को न एक पल याद करती रही, उसके नाम पर बगावत करती रही;
हत्या उस अम्मी की करती रही, अपने गुरुर में नासमझी करती रही।
वतन के नाम पर झूझती रही, मौला के नाम पर हारती रही।
शहंशाह अपने आप को मानती रही, पैगाम एकता का भूलती रही ।
जुनून में हर सीना पार करती रही, कातिल इंसानियत की होती रही।
वक्त की स्याही बजती रही, रक्त के आँसू पीती रही।
जीवन के दायरे में खोती रही, अपने आप में यह हारती रही।
वैश्याओं में आनंद लेती रही, पाक जीवन का नाश करती रही;
अंतर में खोखली होती रही, इस कशमकश में कश्मीर हिलती रही।
- ये अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं के विषय हैं, जिसे “परा” द्वारा बताया गया है।