चाहूँ मैं कि तुझे गले लगूँ कि इस दिल को सुकून मिले,
पर जो इंतेजारी में मिला मजा, वो कहीं और न मिला।
तड़प भरी निगाहें और राह देखती आँखों का प्यार देखा,
कि लब पे तेरा नाम और होंठों पर तेरा पैगाम और क्या चाहिए।
कि दिल के द्वार हैं खुले और आँगन में तेरा आना, और क्या चाहिए।
चाहे ये दिल, तेरे आँचल में सोना और खुद को भुलाना,
कि पास तेरे आना और तुझ में समाना, और क्या चाहिए।
बेताब पलों में तेरा ही नाम और बारिश में तेरी ही तड़प,
कि बिना पीए ही तुझमें झूमना, बोलो और क्या चाहिए।
न खुशी का एहसास, न जुदाई की पहचान, बस तेरी ही पहचान,
बोलो, फिर हमें और क्या चाहिए, और क्या चाहिए?
- डॉ. हीरा